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बस ......अब और नहीं ! Article in Hindi

Rape Article in Hindi


उस अँधेरे और सन्नाटे  में किसी अनहोनी की आशंका से वह काँप रही थी। मगर उसकी चीखों को दबा दिया गया। वह बहुत छटपटाई ,मगर उसकी अस्मत को तार- तार करने के बाद दरिंदों ने अपने कुकर्मों  का निशान मिटाने के लिए उसे जला दिया। इंसान की शक्ल में भेड़ियों की यह वहशत ...... सोच कर भी रूह काँप जाती है।

उस माँ के मन में बार- बार कईं  सवाल आ रहा होंगे  कि काश ,उसकी बेटी ने मदद के लिए आए  भेड़ियों के इरादे भाँप कर उनकी मदद न ली होती। काश ! उसने अपने मोबाइल से अपनी मदद के लिए संपर्क किया होता तो वह आज उनके साथ होती।
 
ऐसे बहुत से प्रश्न उस माँ के दिल में हथोड़े की तरह बज रहे थे। दिल चकनाचूर हो गया था। रही -सही कसर व्यवस्था के खोखलेपन  ने कर दी थी। जिसमें खबरें बिक रही थीं।
आज सुबह से ही दरिंदों की वहशियत की शिकार हुई वह बेटी समाचारों और सोशल मीडिया में चर्चा का विषय बन गई थी । आरोप -प्रत्यारोप चल रहे थे कैसी  विडंबना है, दुर्घटना के होने के बाद सब अपना पक्ष लेकर क्रियाशील हो जाते हैं।

बलात्कार के बढ़ते आंकड़े  दिखाए जा रहे थे । ये आंकड़े समाज के उन दानवों की वहशत को दिखा रहे थे जिन्होंने 3 महीने की बच्ची को भी नहीं बख़्शा।
 

घृणा होती है जब औरत को केवल अपनी भूख मिटाने का साधन मात्र समझने वाले लोग कानून के लचीले पन का फ़ायदा उठाकर बच जाते हैं। वहशत की शिकार या तो मार  दी जाती है  या फ़िर समाज की संकुचित सोच से प्रतिपल मरती है।
कितने लोग जानते हैं कि निर्भया केस के 4 अपराधियों को दी गई फांसी की सजा अभी तक मुकम्मल नहीं हुई। दोषियों की तरफ़ से गुहार लगाई जा रही है कि वे आदतन अपराधी नहीं ,उन्हें सुधरने का मौका दिया जाना चाहिए। जिस पाँचवे अपराधी ने दरिंदगी की इंतहा की, उसे हमारे कानून ने नाबालिग ठहराते हुए सुधार गृह भेज कर 2016 में रिहा कर दिया।

सच तो यह है कि दरिंदे  कभी नाबालिग नहीं होते और न ही वे मदद की गुहार के काबिल होते हैं।
आज भी निर्भया के माता -पिता इंसाफ पूरा होने का इंतज़ार कर रहे हैं।

विडंबना है कि हमारा पढ़ा- लिखा समाज एक बार फ़िर दरिंदगी की शिकार लड़की को निर्भया का नाम देकर सहानुभूति दिखा रहा है।
लेकिन  कब तक ?  दो दिन ,चार दिन …. उसके  बाद हम फ़िर मूक दर्शक बन जाएँगे। जो हो रहा है, वैसा ही चलता रहेगा।  भेड़िए  खुले आम समाज में घूमते रहेंगे और फ़िर कोई और शिकार होगा।

आख़िर कब तक हम व्यवस्था को दोष देते हुए अपना पल्ला झाड़ते रहेंगे ? हम कब जिम्मेदार बनेंगे ?

इतने बड़े लोकतंत्र का हिस्सा हैं ,एक दिन रोष दिखाकर फ़िर क्यों ख़ामोश हो जाते हैं ?

मोमबत्तियाँ जलाकर शोक मनाने की जगह एक जुट होकर आक्रोश दिखाना होगा ताकि बलात्कारियों की रिहाई की कोई गुंजाइश न रहे।  ऐसा कानून हो , जिसमें वहशियत की सजा  केवल मौत हो। आज समाज में जागरुकता की आवश्यकता है। हर माँ से अनुरोध है अपने बच्चियों  की परवरिश को मजबूत बनाइए ताकि वह किसी के गंदे इरादों को भाँप सके।
 
बच्चों को सतर्कता के साथ समझदार बनाइए। विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य से ही निर्णय लेने के योग्य बनाइए।
जरूरत है हमारी  शिक्षा व्यवस्था में किताबी ज्ञान के अलावा नैतिक मूल्यों के विकास की। जरूरत है ऐसी सामाजिक संस्थाओं की , जो  स्कूलों और कॉलेज में लड़कियों को अपनी आत्मरक्षा के लिए  सजग और सबल बनाएँ।

अपने अंदर जिम्मेदारी की आग जलाइए  क्योंकि ज़रूरत है, समाधान की। नहीं तो आए दिन ऐसी घटनाएँ इंसानियत को शर्मसार करती रहेंगी।

चंद पंक्तियाँ कहना चाहूँगी -
केवल तेरी या मेरी नहीं , सबका मान होती हैं बेटियाँ,
यूँ ही ख़ामोश रहेंगे, तो जलती रहेंगी बेटियाँ।
इस घाव को तब तक न भरने दो, जब तक इसके दर्द की आवाज़ से दरिंदों की रूह न काँप  जाए।
अब नहीं ,अपने दिल के टुकड़े को रौंदने देंगें ,
दरिंदों , अब तुम्हें हम चैन से जीने नहीं  देंगे।
सरकारें आती और जाती रहेंगी , कानून बनता और बिगड़ता रहेगा ,
लेकिन ये फूल हमारे बागीचे के मुरझा गए तो ,रेगिस्तान बन जाएगा।
जो हम होने नहीं देंगे , दरिंदों , अब तुम्हे जीने नहीं देंगे।।



परमजीत कौर
01 . 12 . 19

भवदीय,
Paramjit Kaur | paramjit_kaur@live.com



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