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मीलों चलती हुई भीड़

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इस वक्त़ देश एक ऐसे अभूतपर्वू संकट से गुजऱ रहा है, जिसने दुनिया की सबसे ताक़तवर और बड़ी अर्थव्यवस्थाओं को घुटने के बल पर ला दिया है। इस संकट से देश का हर वर्ग जूझ रहा है, पर एक वर्ग जो रहता तो हमारे सामने है, पर हम उसे देख नहीं पाते वो आज सबकी टी.वी. स्क्रीनों पर देखा जा सकता है, हर रोज़ समाचार पत्रों के पहले पन्ने पर उनकी एक तस्वीर जो चीख रही होती है कि उनका अस्तित्व भी हमारे समाज में है और इस देश की अर्थव्यवस्था को चलाने में भी। उनके बिना ना बडी़ -बडी़ सड़कें बन सकती हैं, ना बड़े बड़े मकान, ना ही उनके बिना कोई होटल चल सकता है और ना कोई दफ्तर या फैक्ट्री। फिर ऐसा क्यों होता है कि सरकार की नीतियों में इनका ध्यान नहीं रहता और उनकी समस्याओं को अनदेखा कर दिया जाता है? मुझे नहीं लगता इनकी संख्या इतनी कम है कि चाहे वो नोटबंदी हो या लाॅकडाउन, इन्हें अनदेखा कर नीतियों पर निर्णय ले लिया जाता है। लेकिन क्या ये दायित्व केवल सरकार का है? हममें से कितने लोग हैं जिन्होने सब्जी़ वाले से मोलभाव ना किया हो, या रिक्शा वाले से, ठेले वाले या ऑटो रिक्शा वाले से 10 रूपये के लिए जी जान ना लगाई हो, 10 रूपये बचाने के लिए। आखिर दस-दस रूपये बचाकर ही ब्रांडेड कपड़े या कोई मूवी टिकट या जंकफूड खरीद पाते हैं हम, ये कटाक्ष भी हमें अगर जगा न सका तो बेहतर होगा, हम टी.वी. पर कोई एंटरटेनिंग न्यूज़ देख लें।

सड़कों पर लाखों की संख्या में एक वर्ग अपने घर की ओर निकला तब आंखे खुलीं कि कितनी संख्या में लोग अपना घर छोड़ रोज़ी-रोटी की तलाश में घरों से इतना दूर आकर रहते हैं, छोटी-छोटी झोपड़ियों में एक साथ कई लोग रहते हैं और छोटी-छोटी नौकरी या कोई काम करते हैं। पहले तो वह अपनी राज्य सरकार से ठगे जाते हैं, जिन्होनें राजनीति के नाम पर अच्छा-बुरा सब किया पर विकास नहीं और फिर जहां वो आकर काम करते हैं वहां की सरकारें उनके खिलाफ राजनैतिक विचारधारा फैलाती हैं (जैसे महाराष्ट्र), जिससे उन्हें निम्न दर्जे का नागरिक समझा जाता है। जहां वो काम करते हैं ठेकेदार उन्हें उनका हक़ और मेहनत का पैसा न देकर उन्हें बंधुआ मज़दूर बना लेते हैं, उन्हें कभी पूरा पैसा नहीं दिया जाता, जिससे वो वापस उसी ठेकेदार के पास काम करें और अगर नहीं आते तो जमा या बकाया पैसा मारा जाता है। आखिर आपने सभ्य लोगों को शिकायत करते सुना होगा कि उनके शहर में अब भीड़ बढ़ गई है और शहर की रौनक़ फीकी पड़ गई है, उन्हें अन्दाजा़ तक नही होता कि कोई अपना घर-गांव शौक़ से नही छोड़ता, जीवन उन्हें मजबूर करता है कि वो पलायन करें।

सरकार ने बिना इनके बारे में सोचकर लाॅकडाउन पर निर्णय लिया और 4 बार उसे बढ़ाया मगर उनके रहने और रोज़ी-रोटी का कोई ठोस व मज़बूत इंतज़ाम ना करके इन्हें विवश किया कि जान की परवाह ना करके ये वर्ग 1200-1600 किमी चलकर घर पहुंचने पर मजबूर हो गया। सरकार को चाहिए था कि हर ज़िले में इनकी रहने और रूकने की व्यवस्था के साथ-साथ, इन्हें रेल या बसों से घर पहुंचाया जाता मगर ऐसा न होने के कारण बड़ी ही अमानवीयता के साथ इन्हें इनके हाल पर छोड़ दिया गया। भूख से मरो या कोरोना से, बिना दाल और सब्जी़ के सरकारी सेन्टरों में रोटी खाओ या पुलिस के डंडे। भुगतना इन्हीं को पड़ा। सिर्फ 500 रूपये महीने और गेहूं-चावल या थोड़ी सी दाल का दावा करके अपनी ज़िम्मेदारी से बचना। 70 साल आज़ाद होने के बाद एक ऐसा
मजाक लगता है, जो गरीब को अपनी जान पर खेलकर सहना पड़ता है।

मेरे इस लेख को लिखने का मक़सद सिर्फ इतना है कि जब भी आप किसी प्रवासी मज़दूर या कामगार को देखें तो उसके प्रति अपने हृदय में कम से कम कृतज्ञता रखें और उसके पलायन के संघर्ष को ध्यान में रखकर उससे नम्रता से पेश आएं। आपके लिए जो 10 या 5 रूपये एक बर्गर या मूवी टिकट, कोल्ड ड्रिंक्स ना ले सके, उससे उसका घर चलता है। उसकी छोटी-छोटी ज़रूरतें पूरी होती हैं। उसकी बीमारी का कर्ज़ चुकता होता है। उसके घर वापस जाने का इंतज़ार कम होता है।

हमें पता है सरकारी व्यवस्था को इस लायक बनने में दशकों लगेंगे तथा सरकार भरोसे इनका जीवन संघर्ष शायद कभी खत्म ना हो पाए, हम कम से कम इन्हें आदर और प्रेम देकर इनके दर्द को कम कर सकें। यही अपेक्षा मैं सबसे रखता हूँ।

"लेखक एक समाज सेवक एवं विश्लेषक है, जिसकी अन्य रूचियां दर्शनशास्त्र, काव्य, गद्य का अध्ययन करना तथा प्रकृति से प्रेम करना है।"

संदीप कुमार
@8707632760
sandeep14septem@yahoo.in

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